पाकिस्तान के जनक मोहम्मद अली जिन्ना और भगत सिंह के बीच के संबंधों को लेकर कुछ भी कहना तो दूर की बात, सोचना भी मुश्किल था। लेकिन साल 1996 में ए जी नूरानी की किताब द ट्रायल ऑफ़ भगत सिंह पॉलिटिक्स ऑफ़ जस्टिस प्रकाशित होने के बाद पहली बार ऐसा संभव हो पाया।

इस किताब में सेंट्रल असेंबली की उस पृष्ठभूमि का उल्लेख किया गया है, जब 13 सितंबर 1929 को लाहौर जेल में भूख हड़ताल करने पर जतिन दास की शहादत के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 14 जून, 1929 को भूख हड़ताल शुरू की थी।

आपको जानकारी के लिए बता दें कि 8 अप्रैल, 1929 को सेंट्रल असेंबली (अब संसद भवन) में हुए बम धमाके बाद दिल्ली की अदालत ने भगत सिंह सहित उनके अन्य क्रांतिकारी साथियों को दोषी ठहराया था। इसके बाद उन्हें पंजाब के मियांवली और लाहौर जेल में भेज दिया गया था।

ट्रायल के दौरान जेल में बंद इन क्रांतिकारियों को अख़बारों और अच्छे भोजन की सभी सुविधाएं प्रदान की जा रही थीं। लेकिन दोषी ठहराए जाने के बाद इन्हें ना केवल पंजाब की जेल में भेज दिया गया बल्कि उनसे सभी सुविधाएं वापस ले ली गईं।

भगत सिंह को मियांवली जेल तथा बटुकेश्वर दत्त को लाहौर जेल में रखा गया था। तब इन क्रांतिकारियों ने राजनीतिक कैदी के तरह व्यवहार करने और अख़बार और अच्छे भोजन की मांग की। सॉन्डर्स हत्याकांड की सुनवाई के दौरान 10 जुलाई, 1929 को भगत सिंह को स्ट्रैचर पर कोर्ट में लाया गया था। तब जाकर अन्य कॉमरेड को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की भूख हड़ताल के बारे में पता चल सका था। यह भूख हड़ताल अब राष्ट्रीय मुद्दा बन गया। इस मुद्दे को शिमला में सेंट्रल असेंबली सत्र में भी उठाया गया। 14 जुलाई को इसे अखबार द ट्रिब्यून में प्रकाशित किया गया।

यह मामला 12 सितम्बर, 1929 को केंद्रीय विधानसभा में उठा। इस सत्र में जेल में भूख हड़ताल कर रहे क्रांतिकारियों के लिए यह कहा गया कि कुछ मामलों में आरोपी के अनुपस्थिति होने पर भी मुकद्दमे को आगे बढ़ाया जा सकता है।

इस पर जिन्ना ने सवाल उठाते हुए कहा कि आप उन पर मुकद्दमा चलाना चाहते हो या उन्हें परेशान करना चाहते हैं? यह बात भगत सिंह और उनके दूसरे साथियों के संदर्भ में था, जो कि भूख हड़ताल पर थे और ट्रायल के लिए कोर्ट में उपस्थित नहीं हो सकते थे।

जिन्ना ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि जो आदमी भूख हड़ताल करता है वो उसकी खुद की मर्जी होती है। वह अपने अंतरमन की आवाज सुनते हैं और न्याय में विश्वास करते हैं। शिमला से ट्रिब्यून के संवाददाता ने यह रिपोर्ट दी कि सदन में जिन्ना ने अच्छा प्रभाव डाला और इसके बाद उन्हें प्रशंसा भी मिली। एजी नूरानी के अनुसार, जिन्ना को भगत सिंह और उनके साथियों का सम्मान मिला। जिन्ना ने कहा कि अगर यह संशोधन हुआ तो ट्रायल सिर्फ न्याय के लिए एक मजाक बन कर रह जाएगा।

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