सनातन धर्म में स्वास्तिक को बेहद शुभ माना जाता है। हिंदू शर्म में स्वास्तिक हर शुभ काम में बनाया जाता है। इसका संबंध गणपति से माना जाता है। मान्यता है कि स्वास्ति​क शब्द ‘सु’ और ‘अस्तिका’ से मिलकर बना है। सु का अर्थ है शुभ व अस्तिका से तात्पर्य है होना। इसलिए स्वास्तिक का अर्थ होता है शुभ होना।

स्वास्तिक बनाने से वास्तुदोष समाप्त होता है। साथ ही घर में नकारात्मक शक्ति प्रवेश नहीं कर पाती। आज हम आपको इसी बारे में जानकारी देने जा रहे हैं।

इसलिए होता है शुभ
स्वास्तिक को विघ्नहर्ता गणेश का रूप माना जाता है। माना जाता है कि स्वास्तिक का बाएं तरफ का हिस्सा गं बीज मंत्र होता है। इसे गणपति का स्थान कहा जाता है। स्वास्तिक के चार तरफ बिंदी भी लगती है। इसके बारे में माना जाता है कि बिंदी में माता गौरी, पृथ्वी, कूर्म व देवताओं का वास होता है। इसलिए स्वास्तिक को इतना शुभ माना जाता है।

ब्रह्मा से है संबन्ध
स्वास्तिक की चार रेखाएं होती हैं जिनका सीधा संबंध ब्रह्मा जी से माना गया है। इन्हे ब्रम्हा जी के चार मुख के रूप में माना जाता है। इसके मध्य का भाग भगवान विष्णु की नाभि है। इसी से ब्रह्मा जी प्रकट हुए थे। स्वास्तिक की चारों रेखाएं घड़ी की दिशा में बनती हैं, जो संसार को सही तरह से चलाने का प्रतीक है।

सकारात्‍मक ऊर्जा का प्रतीक है स्वास्तिक
वास्‍तुशास्‍त्र के अनुसार, अगर घर के मुख्य द्वार पर स्वास्तिक बनाया जाए तो भगवान गणेश की कृपा परिवार पर बनी रहती है। इस से घर में धन धान्य आता है। इसलिए जहां स्वास्तिक बना होता है, वहां कभी नकारात्मकता नहीं होती।

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