Crude Oil Price Crash: अमेरिका-ईरान तनाव कम होते ही धड़ाम हुए कच्चे तेल के दाम, वैश्विक बाजार को मिली बड़ी राहत

 
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अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव में नरमी के संकेत मिलने के बाद अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के बाजार में बड़ी गिरावट देखने को मिली है। अमेरिकी प्रशासन द्वारा ईरान के खिलाफ प्रस्तावित हवाई हमलों को फिलहाल रोकने और कूटनीतिक समाधान की दिशा में बढ़ते प्रयासों ने निवेशकों की चिंता काफी हद तक कम कर दी है। इसका सीधा असर सोमवार को क्रूड ऑयल की कीमतों पर पड़ा, जहां ब्रेंट क्रूड में तेज गिरावट दर्ज की गई।

तनाव कम होने से बाजार में लौटा भरोसा

मध्य पूर्व में किसी भी तरह का सैन्य तनाव वैश्विक ऊर्जा बाजार को सीधे प्रभावित करता है। अमेरिका और ईरान के बीच हालिया घटनाक्रम के चलते निवेशकों को आशंका थी कि तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिससे कीमतों में लगातार तेजी बनी हुई थी। हालांकि अब हालात में सुधार के संकेत मिलने के बाद बाजार का रुख बदल गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच बातचीत का रास्ता खुला रहता है और सैन्य कार्रवाई टलती है, तो वैश्विक बाजार में तेल की सप्लाई सामान्य बनी रह सकती है। यही वजह है कि निवेशकों ने जोखिम कम होने के संकेत मिलते ही बड़े पैमाने पर मुनाफावसूली शुरू कर दी।

ब्रेंट क्रूड में एक दिन में बड़ी गिरावट

सोमवार के कारोबारी सत्र में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत करीब 8.7 प्रतिशत टूटकर 88.36 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। यह स्तर पिछले एक सप्ताह का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है। इतनी बड़ी दैनिक गिरावट ने यह संकेत दिया है कि फिलहाल बाजार युद्ध की आशंकाओं से कुछ राहत महसूस कर रहा है।

विश्लेषकों के अनुसार, बीते कुछ दिनों में भू-राजनीतिक तनाव के कारण तेल की कीमतों में तेज उछाल आया था। अब जब संघर्ष की संभावना कम होती दिखाई दे रही है, तो बाजार ने उसी तेजी को वापस समायोजित करना शुरू कर दिया है।

क्यों घटे कच्चे तेल के दाम?

कच्चे तेल की कीमतों में आई इस गिरावट के पीछे कई प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।

  • अमेरिका द्वारा ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई को फिलहाल टालना।

  • दोनों देशों के बीच कूटनीतिक बातचीत की उम्मीद मजबूत होना।

  • मध्य पूर्व में तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका कम होना।

  • निवेशकों द्वारा सुरक्षित निवेश की ओर रुख बदलना।

  • वैश्विक बाजार में जोखिम प्रीमियम में कमी आना।

इन सभी कारणों ने मिलकर तेल बाजार पर दबाव बनाया और कीमतों में तेज गिरावट देखने को मिली।

भारत पर क्या होगा असर?

भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल सस्ता होने से देश को आयात बिल कम करने में मदद मिल सकती है। यदि यह गिरावट कुछ समय तक बनी रहती है, तो तेल विपणन कंपनियों की लागत घट सकती है।

हालांकि इसका फायदा पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में कब और कितना मिलेगा, यह पूरी तरह सरकारी नीतियों, टैक्स ढांचे और तेल कंपनियों की मूल्य निर्धारण प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।

वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए राहत का संकेत

ऊर्जा की कीमतों में कमी का असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहता। कच्चा तेल सस्ता होने से परिवहन, विनिर्माण, विमानन और लॉजिस्टिक्स जैसे कई क्षेत्रों की लागत घट सकती है। इससे महंगाई पर भी कुछ हद तक नियंत्रण पाने में मदद मिल सकती है।

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यदि भू-राजनीतिक हालात स्थिर बने रहते हैं और तेल की कीमतें मौजूदा स्तर के आसपास बनी रहती हैं, तो कई देशों की अर्थव्यवस्था को राहत मिल सकती है।

आगे क्या रहेगा बाजार का रुख?

कमोडिटी बाजार के जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में निवेशकों की नजर अमेरिका और ईरान के बीच होने वाले हर राजनीतिक और कूटनीतिक घटनाक्रम पर रहेगी। यदि तनाव फिर बढ़ता है तो तेल की कीमतों में दोबारा तेजी आ सकती है, जबकि बातचीत आगे बढ़ने की स्थिति में कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।

फिलहाल बाजार में राहत का माहौल दिखाई दे रहा है और कच्चे तेल की कीमतों में आई यह गिरावट वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत मानी जा रही है। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों के लिए भी यह घटनाक्रम राहत देने वाला साबित हो सकता है।

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