Health Tips- क्या स्ट्रोक के कारण बोलने की क्षमता खत्म हो गई है, तो ये म्यूजिक थेरेपी आएगी काम

 
Health Tips: Has a stroke caused a loss of speech? Music therapy can help.

दोस्तो जैसा कि हम सब जानते हैं कि स्ट्रोक एक अचानक होने वाली खतरनाक और जानलेवा बीमारी हैं, जो कई स्वास्थ्य परेशानियों का कारण बनता हैं, स्ट्रोक के बाद बोलने की क्षमता खोने से किसी व्यक्ति के आत्मविश्वास, रिश्तों और जीवन की गुणवत्ता पर बहुत बुरा असर पड़ सकता है। लेकिन स्ट्रोक से बचे लोगों की बोलने की क्षमता वापस लाने में मदद के लिए पहली हिंदी 'मेलोडिक इंटोनेशन थेरेपी' (MIT) विकसित की है। यह नई थेरेपी संगीत, धुन और लय का इस्तेमाल करके दिमाग को सक्रिय करती है, आइए जानते हैं पूरी डिटेल्

Health Tips: Has a stroke caused a loss of speech? Music therapy can help.

मेलोडिक इंटोनेशन थेरेपी (MIT) क्या है?

मेलोडिक इंटोनेशन थेरेपी संगीत पर आधारित एक रिहैबिलिटेशन तकनीक है जो स्ट्रोक के बाद 'अफ़ेसिया' (aphasia) से जूझ रहे लोगों की मदद करती है। अफ़ेसिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें स्ट्रोक के बाद बोलने की क्षमता प्रभावित होती है।

इस थेरेपी में धुन, लय और बार-बार बोलने की एक्सरसाइज़ का मेल होता है।

यह मरीज़ों को बोलने की क्षमता वापस पाने के लिए गाने की अपनी बची हुई क्षमता का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित करती है।

स्ट्रोक से बचे कई लोगों को बोलने में मुश्किल होती है, लेकिन वे जाने-पहचाने गाने गा सकते हैं, जिससे यह थेरेपी बहुत असरदार साबित होती है।

भारत में विकसित पहला हिंदी वर्शन

अब तक, मेलोडिक इंटोनेशन थेरेपी सिर्फ़ अंग्रेज़ी और कुछ पश्चिमी भाषाओं में उपलब्ध थी। भारतीय रिसर्चर्स ने अब इसका पहला प्रमाणित हिंदी वर्शन तैयार किया है।

यह थेरेपी खास तौर पर हिंदी बोलने वालों के लिए डिज़ाइन की गई है।

रिसर्चर्स ने अंग्रेज़ी कंटेंट का सिर्फ़ अनुवाद करने के बजाय, हिंदी भाषा की लय, उच्चारण और बातचीत के स्वाभाविक तरीकों के हिसाब से इलाज को तैयार किया है।

इससे यह थेरेपी भारतीय मरीज़ों के लिए ज़्यादा उपयुक्त और असरदार बन जाती है।

इंटरनेशनल जर्नल में रिसर्च पब्लिश

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इस स्टडी के नतीजे इंटरनेशनल जर्नल 'अफ़ेसियोलॉजी' (Aphasiology) में पब्लिश हुए हैं, जो स्ट्रोक रिहैबिलिटेशन में इस बड़ी कामयाबी के महत्व को बताते हैं।

पायलट स्टडी से उम्मीद जगाने वाले नतीजे

रिसर्चर्स ने हिंदी बोलने वाले छह स्ट्रोक मरीज़ों के साथ एक पायलट स्टडी की।

हर प्रतिभागी ने 40 थेरेपी सेशन पूरे किए।

हर सेशन 45 से 60 मिनट का था।

सभी छह मरीज़ों की बोलने की क्षमता में साफ़ सुधार देखा गया।

मरीज़ लंबे वाक्य बना पाए और ज़्यादा आत्मविश्वास के साथ बातचीत कर पाए।

थेरेपी पूरी करने के बाद उनके जीवन की कुल गुणवत्ता में भी सुधार हुआ।

कोई बड़ा साइड इफ़ेक्ट नहीं देखा गया

इस स्टडी की एक अच्छी बात इसकी सुरक्षा है।

रिसर्चर्स ने इलाज के दौरान कोई बड़ा साइड इफ़ेक्ट नहीं देखा।

सभी प्रतिभागियों ने इस थेरेपी को आसानी से अपनाया।

और रिसर्च की ज़रूरत

हालांकि शुरुआती नतीजे उम्मीद जगाने वाले हैं, लेकिन रिसर्चर्स का कहना है कि यह एक छोटे स्तर की स्टडी थी। इस पायलट प्रोजेक्ट में सिर्फ़ छह मरीज़ों ने हिस्सा लिया।

इस थेरेपी की असरदारता को बड़े पैमाने पर साबित करने के लिए और बड़े क्लिनिकल ट्रायल की ज़रूरत है।

भविष्य की रिसर्च इसे इलाज के एक स्टैंडर्ड तरीके के तौर पर स्थापित करने में मदद करेगी।

ज़्यादा लोगों तक पहुँचने के लिए डिजिटल टूल्स की योजना

रिसर्च टीम इस थेरेपी को अस्पतालों से बाहर भी ले जाने की योजना बना रही है।

इसके लिए डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म और टूल्स तैयार किए जा रहे हैं।

इन नई तकनीकों से छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों के मरीज़ घर बैठे या पास के हेल्थकेयर सेंटर्स से इस थेरेपी का फ़ायदा उठा सकेंगे।

इसका मकसद पूरे भारत में स्पीच रिहैबिलिटेशन (बोलने की क्षमता को फिर से ठीक करने की प्रक्रिया) को ज़्यादा लोगों तक पहुँचाना है।