​​हिंदू धर्म में प्रयाग को तीर्थराज प्रयाग के नाम से जाना जाता है। गंगा-यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम स्थल पर हर साल माघ मेले का आयोजन होता है। मान्यता है कि इस धरती पर प्रयाग ही एक ऐसा तीर्थस्थल है, जो कामद भी और मोक्षद भी है। अर्थात प्रयागराज का तीर्थस्थल कामनाओं की पूर्ति के साथ-साथ मोक्ष देने वाला भी है।

हिंदू धर्म में मान्यता है कि प्रयाग तीर्थ की सेवा देवता, मुनि, दैत्य आदि सभी करते हैं। प्रयाग में विश्व के सभी तीर्थ और देव, दनुज, किन्नर, नाग, गन्धर्व एकत्र होकर आदरपूर्वक त्रिवेणी में स्नान करते हैं।

हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार, ब्रह्याजी ने अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, काॅची, जगन्नाथपुरी और उज्जैन इन सात पुरियों को तुला के एक पलड़े पर रखा और दूसरे पलड़े पर सातों कुल पर्वतों को रखा। नतीजा यह निकला कि इन सातों पुरियों का पलड़ा भारी रहा। इतना ही नहीं सातों समुद्रों, सातों द्वीपों और नवखंण्डों को भी बारी-बारी से पलड़े पर रखा फिर भी सप्तपुरियों का पलड़ा भारी रहा। ऐसा देख ब्रह्याजी, देवगण और ऋषिगण चकित रह गए।

ब्रह्याजी ने शेषनाग से कहा कि इन सप्त पुरियों सहित सभी कुल-पर्वतों, द्वीपों, समुद्रों, तीर्थों को एक पलड़े पर रखिए और दूसरे पलड़े पर प्रयाग को रखिए। ऐसा करने पर दोनों पलड़े बराबर हो गए। प्रयाग क्षेत्र का विस्तार पांच कोस में है। प्रयाग को षटकूल क्षेत्र भी कहते हैं। प्रयाग में गंगा के दो किनारे, यमुना के दो किनारे और संगम के दो किनारे ये सभी मिलकर छह तट होते हैं। मान्यता है कि प्रयाग में ज्ञानी-अज्ञानी को समान फल मिलता है।

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